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Wednesday, 24 January 2018

પદમાવતી રાણી અને ચિતોડગઢ નો ઈતિહાસ - रानी पद्मिनी का इतिहास | Rani Padmini History in Hindi - Special Offer Independence Day Tally Mobile App - Rani Padmini / Rani Padmavati History in Hindi रानी पद्मिनी / रानी पद्मावती का इतिहास व कहानी

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रानी पद्मिनी का इतिहास | Rani Padmini History in Hindi

Rani Padmini – रानी पद्मिनी (पद्मावती – Padmavati) – पद्मावत की एक महान रानी थी। जिनपर कवी मलिक मुहम्मद जायसी ने एक कविता भी लिखी है। रानी पद्मावती अपनी सुन्दरता के लिये पुरे भारत में जानी जाती थी।
लेकिन रानी पद्मिनी के अस्तित्व को लेकर इतिहास में कोई दस्तावेज मौजूद नही है। लेकिन चित्तोड़ में हमें रानी पद्मावतीकी छाप दिखाई देती है।
पद्मिनी ने अपना जीवन अपने पिता गंधर्वसेन और माता चम्पावती के के साथ सिंहाला में व्यतीत किया था। पद्मिनी के पास एक बोलने वाला तोता “हीरामणि” भी था। उनके पिता ने पद्मावती के विवाह के लिये स्वयंवर भी आयोजित किया था जिसमे आस-पास के सभी हिन्दू-राजपूत राजाओ को आमंत्रित किया गया था। एक छोटे से राज्य के राजा मलखान सिंह भी उनसे विवाह करने के लिये पधारे थे।
चित्तोड़ के राजा रावल रतन सिंह रानी नागमती के होते हुए भी स्वयंवर में आये थे। और उन्होंने मलखान सिंह को पराजित कर पद्मिनी से विवाह भी कर लिया था। क्योकि राजा रावल रतन सिंह स्वयंवर के विजेता थे। स्वयंवर के बाद वे अपनी सुंदर रानी पद्मिनी के साथ चित्तोड़ लौट आये थे।
12 वी और 13 वी शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के आक्रमणकारीयो की ताकत धीरे-धीरे बढ़ रही थी। इसके चलते सुल्तान ने दोबारा मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया था। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने सुंदर रानी पद्मावती को पाने के इरादे से चित्तोड़ पर भी आक्रमण कर दिया था। यह पूरी कहानी इतिहासकार अलाउद्दीन के लिखान पर आधारित है जिन्होंने इतिहास में राजपूतो पर हुए आक्रमणों को अपने लेखो से प्रदर्शित किया था।
लेकिन कुछ लोगो को उनकी इन कहानियो पर जरा भी भरोसा नही था क्योकि उनके अनुसार अलाउद्दीन के लेख मुस्लिम सूत्रों पर आधारित थे, जिसमे मुस्लिमो को महान बताया गया था। उनके अनुसार अलाउद्दीन ने इतिहास के कुछ तथ्यों को अपनी कलम बनाकर काल्पनिक सच्चाई पर आधारित कहानियाँ बनायी थी।
उन दिनों चित्तोड़ राजपूत राजा रावल रतन सिंह के शासन में था, जो एक बहादुर और साहसी योद्धा भी थे। एक प्रिय पति होने के साथ ही वे एक बेहतर शासक भी थे, इसके साथ ही रावल सिंह को कला में भी काफी रूचि थी। उनके दरबार में काफी बुद्धिमान लोग थे, उनमे से एक संगीतकार राघव चेतन भी था।
ज्यादातर लोगो को इस बात की जानकारी आज भी नही है की राघव चेतन एक जादूगर भी थे। वे अपनी इस कला का उपयोग शत्रुओ को चकमा या अचंभित करने के लिये आपातकालीन समय में ही करते थे।
लेकिन राघव सिंह के कारनामे सभी के सामने आने के बाद राजा बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने उसे अपने राज्य से निकाले जाने का भी आदेश दिया था। और उनके चेहरे को काला कर उन्हें गधे पर बिठाकर राज्य में घुमाने का आदेश भी दिया था। इस घटना के बाद वे राजा के सबसे कट्टर दुश्मनों में शामिल हो गए थे।
इसके बाद राघव चेतन ने दिल्ली की तरफ जाने की ठानी और वहाँ जाकर वे दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को चित्तोड़ पर आक्रमण करने के लिये मनाने की कोशिश करते रहते।
दिल्ली आने के बाद राघव चेतन दिल्ली के पास ही वाले जंगल में रहने लगे थे, जहाँ सुल्तान अक्सर शिकार करने के लिये आया करते थे। एक दिन सुल्तान के शिकार की आवाज सुनते ही राघव ने अपनी बांसुरी बजाना शुरू कर दी। जब राघव चेतन की धुन सुल्तान की सेना और उन्हें सुनाई दी तो वे सभी आश्चर्यचकित हो गए थे की इस घने जंगल में कौन इतनी मधुर ध्वनि से बाँसुरी बजा रहा होगा।
सुल्तान ने अपने सैनिको को बाँसुरी बजाने वाले इंसान को ढूंडने का आदेश दिया और जब राघव चेतन स्वयं उनके सामने आये तब सुल्तान ने उनसे अपने साथ दिल्ली के दरबार में आने को कहा। तभी राघव चेतन ने सुल्तान से कहाँ की वह एक साधारण संगीतकार ही है और ऐसे ही और भी बहुत से गुण है उसमे। और जब राघव चेतन ने अलाउद्दीन को रानी पद्मावती की सुन्दरता के बारे में बताया तो अलाउद्दीन मन ही मन रानी पद्मावती को चाहने लगे थे।
इसके तुरंत बाद वे अपने राज्य में गये और अपनी सेना को चित्तोड़ पर आक्रमण करने का आदेश दिया, ताकि वे बेहद खुबसूरत रानी पद्मावती – Rani Padmini को हासिल कर सके और अपने हरम में ला सके।
चित्तोड़ पहुचते ही अलाउद्दीन खिलजी के हाथ निराशा लगी क्योकि उन्होंने पाया की चित्तोड़ को चारो तरफ से सुरक्षित तरीके से सुरक्षा प्रदान की गयी है। लेकिन वे रानी पद्मावती की सुन्दरता को देखने का और ज्यादा इंतज़ार नही करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने राजा रतन सिंह के लिये यह सन्देश भेजा की वे रानी पद्मावती को बहन मानते है और उनसे मिलना चाहते है।
इसे सुनने के बाद निराश रतन सिंह को साम्राज्य को तीव्र प्रकोप से बचाने का एक मौका दिखाई दिया।
रानी पद्मावती – Rani Padmini ने अलाउद्दीन को उनके प्रतिबिम्ब को आईने में देखने की मंजूरी दे दी थी। अलाउद्दीन ने भी निर्णय लिया की वे रानी पद्मावती को किसी भी हाल में हासिल कर ही लेंगे। अपने कैंप ने वापिस आते समय अलाउद्दीन कुछ समय तक राजा रतन सिंह के साथ ही थे। सही मौका देखते ही अलाउद्दीन ने राजा रतन सिंह को बंदी बना लिया और बदले में रानी पद्मावती को देने के लिये कहा।
सोनगरा के चौहान राजपूत जनरल गोरा और बादल ने सुल्तान को उन्ही के खेल में पराजित करने की ठानी और कहा की अगली सुबह उन्हें रानी पद्मावती दे दी जायेंगी। उसी दिन 150 पालकी (जिसे पूरी तरह से सजाकर, ढककर उस समय में चार इंसानों द्वारा एक स्थान से स्थान पर ले जाया जाता था। (उस समय इसका उपयोग शाही महिलाये एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाने के लिए करती थी) मंगवाई और उन्हें किले से अलाउद्दीन के कैंप तक ले जाया गया और पालकीयो को वही रोका गया जहाँ राजा रतन सिंह को बंदी बनाकर रखा गया था।
जब राजा ने देखा की पालकियाँ चित्तोड़ से आयी है तो राजा को लगा की उसमे रानी भी आयी होगी और ऐसा सोचकर ही वे शर्मिंदा हो गये थे। लेकिन जब उन्होंने देखा की पालकी से बाहर रानी नही बल्कि उनकी महिला कामगार निकली है और सभी पालकियाँ सैनिको से भरी हुई है तो वे पूरी तरह से अचंभित थे।
सैनिको ने पालकी से बाहर निकालकर तुरंत अलाउद्दीन के कैंप पर आक्रमण कर दिया और सफलता से राजा रतन सिंह को छुड़ा लिया। जिसमे दोनों राजपूत जनरल ने बलपूर्वक और साहस दिखाकर अलाउद्दीन की सेना का सामना किया था और रतन सिंह को उन्होंने सुरक्षित रूप से महल में पंहुचा दिया था। जहाँ रानी पद्मावती उनका इंतजार कर रही थी।
इस बात को सुनते ही सुल्तान आग-बबूला हो चूका था और उसने तुरंत चित्तोड़ पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। सुल्तान की आर्मी ने चित्तोड़ की सुरक्षा दिवार को तोड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन ऐसा करने में वे सफल नही हो सके। तभी अलाउद्दीन ने किले को चारो तरफ से घेरना शुरू कर दिया। ऐसा पाते ही राजा रतन सिंह ने सभी राजपूतो को आदेश दे दिया की सभी द्वार खोलकर अलाउद्दीन की सेना का सामना करे।
आदेश सुनते ही रानी पद्मावती ने देखा की उनकी सेना का सामना विशाल सेना से हो रहा है और तभी उन्होंने चित्तोड़ की सभी महिलाओ के साथ जौहर करने का निर्णय लिया, उनके अनुसार दुश्मनों के हाथ लगने से बेहतर जौहर करना ही था।
जौहर एक इसी प्रक्रिया है जिनमे शाही महिलाये अपने दुश्मन के साथ रहने की बजाये स्वयं को एक विशाल अग्निकुंड में न्योछावर कर देती है।
इस तरह खुद का जौहर कर उन्होंने आत्महत्या कर दी थी। जिसमे एक विशाल अग्निकुंड में चित्तोड़ की सभी महिलाये ख़ुशी से कूद गयी थी। यह खबर पाते ही चित्तोड़ के सैनिको ने पाया की अब उनके पास जीने का कोई मकसद नही है और तभी उन्होंने सका करने का निर्णय लिया। जिसमे सभी सैनिक केसरी पोशाक और पगड़ी के पहनावे में सामने आये और उन्होंने अलाउद्दीन की सेना का मरते दम तक सामना करने का निर्णय लिया था। इस विनाशकारी विजय के बाद अलाउद्दीन की सेना केवल राख और जले हुए शरीर को देखने के लिये किले में आ सकी।
आज भी चित्तोड़ की महिलाओ के जौहर करने की बात को लोग गर्व से याद करते है। जिन्होंने दुश्मनों के साथ रहने की बजाये स्वयं को आग में न्योछावर करने की ठानी थी। राणी पद्मिनी – Rani Padmini के बलिदान को इतिहास में सुवर्ण अक्षरों से लिखा गया है।

Source :-http://www.gyanipandit.com/rani-padmini-history-in-hindi/

Rani Padmini / Rani Padmavati History in Hindi 

रानी पद्मिनी / रानी पद्मावती का इतिहास व कहानी


 भारतीय इतिहास के पन्नों में अत्यंत सुंदर और साहसी रानी; रानी पद्मावती का उल्लेख है। रानी पद्मावती को रानी पद्मिनी के नाम से भी जाना जाता है। रानी पद्मावती के पिता सिंघल प्रांत (श्रीलंका) के राजा थे। उनका नाम गंधर्वसेन था। और उनकी माता का नाम चंपावती था। पद्मावती बाल्य काल से ही दिखने में अत्यंत सुंदर और आकर्षक थीं। उनके माता-पिता नें उन्हे बड़े लाड़-प्यार से बड़ा किया था। कहा जाता है बचपन में पद्मावती के पास एक बोलता तोता था जिसका नाम हीरामणि रखा गया था।

रानी पद्मावती का स्वयंवर

महाराज गंधर्वसेन नें अपनी पुत्री पद्मावती के विवाह के लिए उनका स्वयंवर रचाया था जिस में भाग लेने के लिए भारत के अगल अलग हिन्दू राज्यों के राजा-महाराजा आए थे। गंधर्वसेन के राज दरबार में लगी राजा-महाराजाओं की भीड़ में एक छोटे से राज्य का पराक्रमी राजा मल्खान सिंह भी आया था। उसी स्वयंवर में विवाहित राजा रावल रत्न सिंह भी मौजूद थे। उन्होनें मल्खान सिंह को स्वयंवर में परास्त कर के रानी पद्मिनी पर अपना अधिकार सिद्ध किया और उनसे धाम-धूम से विवाह रचा लिया। इस तरह राजा रावल रत्न सिंह अपनी दूसरी पत्नी रानी पद्मावती को स्वयंवर में जीत कर अपनी राजधानी चित्तौड़ वापस लौट गये।

चित्तौड़ राज्य

प्रजा प्रेमी और न्याय पालक राजा रावल रत्न सिंह चित्तौड़ राज्य को बड़े कुशल तरीके से चला रहे थे। उनके शासन में वहाँ की प्रजा हर तरह से सुखी समपन्न थीं। राजा रावल रत्न सिंह रण कौशल और राजनीति में निपुण थे। उनका भव्य दरबार एक से बढ़कर एक महावीर योद्धाओं से भरा हुआ था। चित्तौड़ की सैन्य शक्ति और युद्ध कला दूर-दूर तक मशहूर थी।

चित्तौड़ का प्रवीण संगीतकार राघव चेतन

चित्तौड़ राज्य में राघव चेतन नाम का संगीतकार बहुत प्रसिद्ध था। महाराज रावल रत्न सिंह उन्हे बहुत मानते थे इसीलिये राज दरबार में राघव चेतन को विशेष स्थान दिया गया था। चित्तौड़ प्रजा और वहाँ के महाराज को उन दिनों यह बात मालूम नहीं थी की राघव चेतन संगीत कला के अतिरिक्त जादू-टोना भी जनता था। ऐसा कहा जाता है की राघव चेतन अपनी इस आसुरी प्रतिभा का उपयोग शत्रु को परास्त करने और अपने कार्य सिद्ध करने में करता था। एक दिन राघव चेतन जब अपना कोई तांत्रिक कार्य कर रहा था तब उसे रंगे हाथों पकड़ लिया गया और राजदरबार में राजा रावल रत्न सिंह के समक्ष पेश कर दिया गया। सभी साक्ष्य और फरियादी पक्ष की दलील सुन कर महाराज नें चेतन राघव को दोषी पाया और तुरंत उसका मुंह  काला करा कर गधे पर बैठा कर देश निकाला दे दिया।

अलाउद्दीन खिलजी से मिला राघव चेतन

अपने अपमान और राज्य से निर्वासित किये जाने पर राघव चेतन बदला लेने पर आमादा हो गया। अब उसके जीवन का एक ही लक्ष्य रहे गया था और वह था चित्तौड़ के महाराज रावल रत्न सिंह का सम्पूर्ण विनाश। अपने इसी उद्देश के साथ वह दिल्ली राज्य चला गया। वहां जाने का उसका मकसद दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी को उकसा कर चित्तौड़ पर आक्रमण करवा कर अपना प्रतिशोध पूरा करने का था।
12वीं  और 13वीं सदी में दिल्ली की गद्दी पर अलाउद्दीन खिलजी का राज था। उन दिनों दिल्ली के बादशाह से मिलना इतना आसान कार्य नहीं था। इसीलिए राघव चेतन दिल्ली के पास स्थित एक जंगल में अपना डेरा डाल कर रहने लगता है क्योंकि वह जानता था कि दिल्ली का बादशाह अलाउद्दीन खिलजी शिकार का शौक़ीन है और वहाँ पर उसकी भेंट ज़रूर अलाउद्दीन खिलजी से हो जाएगी। कुछ दिन इंतज़ार करने के बाद आखिर उसे सब्र का फल मिल जाता है।
एक दिन अलाउद्दीन खिलजी अपने खास सुरक्षा कर्मी लड़ाकू दस्ते के साथ घने जंगल में शिकार खेलने पहुँचता है। मौका पा कर ठीक उसी वक्त राघव चेतन अपनी बांसुरी बजाना शुरू करता है। कुछ ही देर में बांसुरी के सुर बादशाह अलाउद्दीन खिलजी और उसके दस्ते के सिपाहियों के कानों में पड़ते हैं। अलाउद्दीन खिलजी फ़ौरन राघव चेतन को अपने पास बुला लेता है राज दरबार में आ कर अपना हुनर प्रदर्शित करने का प्रस्ताव देता है। तभी चालाक राघव चेतन अलाउद्दीन खिलजी से कहता है-
आप मुझ जैसे साधारण कलकार को अपनें राज्य दरबार की शोभा बना कर क्या पाएंगे, अगर हासिल ही करना है तो अन्य समपन्न राज्यों की ओर नज़र दौड़ाइये जहां एक से बढ़ कर एक बेशकीमती नगीने मौजूद हैं और उन्हे  जीतना और हासिल करना भी सहज है।
अलाउद्दीन खिलजी तुरंत राघव चेतन को पहेलिया बुझानें की बजाए साफ-साफ अपनी बात बताने को कहता हैं। तब राघव चेतन चित्तौड़ राज्य की सैन्य शक्ति, चित्तौड़ गढ़ की सुरक्षा और वहाँ की सम्पदा से जुड़ा एक-एक राज़ खोल देता है और राजा रावल रत्न सिंह की धर्म पत्नी रानी पद्मावती के अद्भुत सौन्दर्य का बखान भी कर देता है। यह सब बातें जान कर अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ राज्य पर आक्रमण कर के वहाँ की सम्पदा लूटने, वहाँ कब्ज़ा करने और परम तेजस्वी रूप रूप की अंबार रानी पद्मावती को हासिल करने का मन बना लेता है।

अलाउद्दीन खिलजी की चित्तौड़ राज्य पर आक्रमण की योजना


राघव चेतन की बातें सुन कर अलाउद्दीन खिलजी नें कुछ ही दिनों में चित्तौड़ राज्य पर आक्रमण करने का मन बना लिया और अपनी एक विशाल सेना चित्तौड़ राज्य की और रवाना कर दी। अलाउद्दीन खिलजी की सेना चित्तौड़ तक पहुँच तो गयी पर चित्तौड़ के किले की अभेद्य सुरक्षा देख कर अलाउद्दीन खिलजी की पूरी सेना स्तब्ध हो गयी। उन्होने वहीं किले के आस पास अपने पड़ाव डाल लिए और चित्तौड़ राज्य के किले की सुरक्षा भेदने का उपाय ढूँढने लगे।

अलाउद्दीन खिलजी नें राजा रावल रत्न सिंह को भेजा कपट संदेश

जब से राजा रावल रत्न सिंह नें रूप सुंदरी रानी पद्मावती को स्वयमर में जीता था तभी से पद्मावती अपनी सुंदरता के लिये दूर-दूर तक चर्चा का विषय बनी हुई थी। इस बात का फायदा उठाते हुए कपटी अलाउद्दीन खिलजी नें चित्तौड़ किले के अंदर राजा रावल रत्न सिंह के पास एक संदेश भिजवाया कि वह रानी पद्मावती की सुंदरता का बखान सुन कर उनके दीदार के लिये दिल्ली से यहाँ तक आये हैं और अब एक बार रूप सुंदरी रानी पद्मावती को दूर से देखने का अवसर चाहते हैं।
अलाउद्दीन खिलजी नें यहाँ तक कहा की वह रानी पद्मावती को अपनी बहन समान मानते हैं और वह सिर्फ उसे दूर से एक नज़र देखने की ही तमन्ना रखते हैं।

चित्तौड़ के महाराज रावल रत्न सिंह का अलाउद्दीन खिलजी को जवाब

अलाउद्दीन खिलजी की इस अजीब मांग को राजपूत मर्यादा के विरुद्ध बता कर राजा रावल रत्न सिंह नें ठुकरा दिया। पर फिर भी अलाउद्दीन खिलजी नें रानी पद्मावती को बहन समान बताया था इसलिये उस समय एक रास्ता निकाला गया। पर्दे के पीछे रानी पद्मावती सीढ़ियों के पास से गुज़रेंगी और सामने एक विशाल काय शीशा रखा जाएगा जिसमें रानी पद्मावती का प्रतिबिंम अलाउद्दीन खिलजी देख सकते हैं। इस तरह राजपूतना मर्यादा भी भंग ना होगी और अलाउद्दीन खिलजी की बात भी रह जायेगी।

अलाउद्दीन खिलजी नें दिया धोखा

शर्त अनुसार चित्तौड़ के महाराज ने अलाउद्दीन खिलजी को आईने में रानी पद्मावती का प्रतिबिंब दिखला दिया और फिर अलाउद्दीन खिलजी को खिला-पिला कर पूरी महेमान नवाज़ी के साथ चित्तौड़ किले के सातों दरवाज़े पार करा कर उनकी सेना के पास छोड़ने खुद गये। इसी अवसर का लाभ ले कर कपटी अलाउद्दीन खिलजी नें राजा रावल रत्न सिंह को बंदी बना लिया और किले के बाहर अपनी छावनी में कैद कर दिया।
इसके बाद संदेश भिजवा दिया गया कि –
अगर महाराज रावल रत्न सिंह को जीवित देखना है तो रानी पद्मावती को फौरन अलाउद्दीन खिलजी की खिदमद में किले के बाहर भेज दिया जाये।

रानी पद्मावती, चौहान राजपूत सेनापति गौरा और बादल की युक्ति

चित्तौड़ राज्य के महाराज को अलाउद्दीन खिलजी की गिरफ्त से सकुशल मुक्त कराने के लिये रानी पद्मावती, गौरा और बादल नें मिल कर एक योजना बनाई। इस योजना के तहत किले के बाहर मौजूद अलाउद्दीन खिलजी तक यह पैगाम भेजना था की रानी पद्मावती समर्पण करने के लिये तैयार है और पालकी में बैठ कर किले के बाहर आने को राज़ी है। और फिर पालकी में रानी पद्मावती और उनकी सैकड़ों दासीयों की जगह नारी भेष में लड़ाके योद्धा भेज कर बाहर मौजूद दिल्ली की सेना पर आक्रमण कर दिया जाए और इसी अफरातफरी में राजा रावल रत्न सिंह को अलाउद्दीन खिलजी की कैद से मुक्त करा लिया जाये।

रानी पद्मावती के इंतज़ार में बावरा हुआ अलाउद्दीन खिलजी

कहा जाता है की वासना और लालच इन्सान की बुद्धि हर लेती है। अलाउद्दीन खिलजी के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब चित्तौड़ किले के दरवाज़े एक के बाद एक खुले तब अंदर से एक की जगह सैकड़ों पालकियाँ बाहर आने लगी। जब यह पूछा गया की इतनी सारी पालकियाँ क्यूँ साथ हैं तब अलाउद्दीन खिलजी को यह उत्तर दिया गया की यह सब रानी पद्मावती की खास दासीयों का काफिला है जो हमेशा उनके साथ जाता है।
अलाउद्दीन खिलजी रानी पद्मावती पर इतना मोहित था की उसने इस बात की पड़ताल करना भी ज़रूरी नहीं समझा की सभी पालकियों को रुकवा कर यह देखे कि उनमें वाकई में दासियाँ ही है। और इस तरह चित्तौड़ का एक पूरा लड़ाकू दस्ता नारी भेष में किले के बाहर आ पहुंचा। कुछ ही देर में अलाउद्दीन खिलजी नें रानी पद्मावती की पालकी अलग करवा दी और परदा हटा कर उनका दीदार करना चाहा। तो उसमें से राजपूत सेनापति गौरा निकले और उन्होने आक्रमण कर दिया। उसी वक्त चित्तौड़ सिपाहीयों नें भी हमला कर दिया और वहाँ मची अफरातफरी में बादल नें राजा रावल रत्न सिंह को बंधन मुक्त करा लिया और उन्हे अलाउद्दीन खिलजी के अस्तबल से चुराये हुए घोड़े पर बैठा कर सुरक्षित चित्तौड़ किले के अंदर पहुंचा दिया। इस लड़ाई मे राजपूत सेनापति गौरा और पालकी के संग बाहर आये सभी योद्धा शहीद हो गये।

अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण

अपनी युक्ति नाकाम हो जाने की वजह से बादशाह अलाउद्दीन खिलजी झल्ला उठा उसनें उसी वक्त चित्तौड़ किले पर आक्रमण कर दिया पर वे  उस अभेद्य किले में दाखिल नहीं हो सके। तब उन्होने किले में खाद्य और अन्य ज़रूरी चीजों के खत्म होने तक इंतज़ार करने का फैसला लिया। कुछ दिनों में किले के अंदर खाद्य आपूर्ति समाप्त हो गयी और वहाँ के निवासी किले की सुरक्षा से बाहर आ कर लड़ मरने को मजबूर हो गये। अंत में रावल रत्न सिंह नें द्वार खोल कर आर- पार की लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया और किले के दरवाज़े खोल दिये। किले की घेराबंदी कर के राह देख रहे मौका परस्त अलाउद्दीन खिलजी ने और उसकी सेना नें दरवाज़ा खुलते ही तुरंत आक्रमण कर दिया।
इस भीषण युद्ध में पराक्रमी राजा रावल रत्न सिंह वीर गति हो प्राप्त हुए और उनकी पूरी सेना भी हार गयी। अलाउद्दीन खिलजी नें एक-एक कर के सभी राजपूत योद्धाओं को मार दिया और किले के अंदर घुसने की तैयारी कर ली।

चित्तौड़ की महारानी पद्मावती और नगर की सभी महिलाओं नें लिया जौहर करने का फैसला


युद्ध में राजा रावल रत्न सिंह के मारे जाने और चित्तौड़ सेना के समाप्त हो जाने की सूचना पाने के बाद रानी पद्मावती जान चुकी थी कि अब अलाउद्दीन खिलजी की सेना किले में दाखिल होते ही चित्तौड़ के आम नागरिक पुरुषों और बच्चों को मौत के घाट उतार देगी और औरतों को गुलाम बना कर उन पर अत्याचार करेगी। इसलिये राजपूतना रीति अनुसार वहाँ की सभी महिलाओं नें जौहर करने का फैसला लिया।

जौहर की रीति निभाने के लिए  नगर के बीच एक बड़ा सा अग्नि कुंड बनाया गया और रानी पद्मावती और अन्य महिलाओं ने एक के बाद एक महिलायेँ उस धधकती चिता में कूद कर अपने प्राणों की बलि दे दी।
इतिहास में राजा रावल रत्न सिंह, रानी और पद्मावती, सेना पति गौरा और बादल का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है और चित्तौड़ की सेना वहाँ के आम नागरिक भी सम्मान के साथ याद किये जाते हैं जिनहोने अपनी जन्म भूमि की रक्षा के खातिर अपने प्राणों का बलिदान दिया।
Team AKC
Source :-https://www.achhikhabar.com/2017/08/16/rani-padmavati-history-in-hindi-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A5%80/
Source :-https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%80
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